Rishi
@rishi.d
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जहाँ भी स्थूलता एवं वर्णन के संकट में फँसने का भय है, उस ओर कवि-कल्पना जाना नहीं चाहती। लेकिन, स्थूलता और वर्णन के संकट का मुकाबला किए बिना कथा-काव्य लिखनेवाले का काम नहीं चल सकता।
when our sense of a subjective “I” disintegrates,